कोरिया:: उफ ! ये फ़कीर राजा की थाती सम्हालने वाले! …. महेंद्र दुबे की कलम से…!

लेखक-महेंद्र दुबे हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता व साहित्यकार हैं.

विधायकी के तीन खेमों में बटीं कोरिया कांग्रेस के स्वंभू प्रवक्ताओं ने, सत्ता प्राप्ति के महज डेढ़ साल में ही जमीन छोड़कर आसमान में उड़ने का हुनर सीख लिया है! जिले के माननीय विधायकों के हर कार्यक्रम में हाजिर नाजिर रहने वाले ये हवाबाज प्रवक्ता, विधायक के साथ विभिन्न एंगल से लिए गए फ़ोटो और वीडियो, फेसबुक और व्हाट्सएप में अपलोड करने के कायदे के फायदे समझते भी है और फायदा पहुंचाने वालों को समझाते भी रहते है! कांग्रेस के विधानसभा चुनाव जीतने के बाद जिले के छपास संक्रमित नेताओं और उदासीन संगठन के मिलापस्थल में पनप आये इन सियासी खरपतवारों ने इन्ही तस्वीरों की बदौलत खड़े किए सियासी भ्रम में खुद को वटवृक्ष के तौर पर प्रचारित कर रखा है! मसला सिर्फ यहीं तक होता तो भी समझ में आता लेकिन अफसोसनाक तो ये है कि तेंदुआ के ग्रामीण अंचल से जनकपुर के वनक्षेत्र तक कांग्रेस के संघर्ष में कोरिया कुमार के हमराह रहे कई दिग्गज क्षेत्रीय क्षत्रप पैलेस का रास्ता ही भूल चुके है! जिले में स्व.कोरिया कुमार के प्रति आजीवन समर्पित रहे आदिवासी नेतृत्व की उड़ान को उनके रिश्तेदारों के पांव में बेड़ियां डाल कर रोकने की नई रणनीति जिले में शुरू हुई है। सोनहत घाट चढ़ने की होड़ में लगी एक अलग युवा प्रजाति जिले के व्हाट्सएप ग्रुपों में, कभी सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल्स का जाल फैला देती है, कभी अंतरष्ट्रीय स्टेडियम तामीर करने लगती है तो कभी केन्द्र सरकार को किसी केंद्रीय विषय के मामले में लिखी सिफारिशी चिठ्ठी को सेक्शन आदेश की तरह प्रचारित कर देती है ! उधर एकला चलो रे वाले डॉक्टर साहब के छपास रोग से ग्रसित एक सियासी वर्ग की माने तो हवाई पट्टी के लिए जमीन भले न मिले, उड़ान तो जरूर भरी जायेगी साथ ही उनके समर्थकों की सोशल मीडिया पोस्ट से तो यही जाहिर होता है कि छत्तीसगढ़ सरकार का पूरा बजट मनेन्द्रगढ़ में ही खर्च किये जाने का अघोषित करार, प्रदेश सरकार से हो ही चुका है!

स्व. रामचन्द्र सिंह जूदेव की धड़कनों में बसने वाले बैकुंठपुर विधानसभा ने राजनीति की काजल कोठरी में किसी संत के आकर स्थापित होने, कोरिया के दिल में राज करने और पूरी गरिमा के साथ विदा होने का करिश्मा न केवल अपनी आंखों से देखा था बल्कि उस संत सदृश्य राजा की सादगी और फकीरी को लगभग चालीस साल जिया भी था ! गांव की सड़क के किनारे निर्माणाधीन किसी स्कूल या पंचायत भवन के सामने काली एम्बेसडर रोक कर घटिया क्वालिटी के सीमेंट-बालू फिकवा देने वाले उस फकीर राजा की थाती सम्हालने का दावा करने वाले आजकल के दरबारीलाल स्व. कोरिया कुमार के फिकवाये गए उसी घटिया सीमेंट-बालू के भ्रष्ठ गिलावे में मुंह मारने को बेताब रहते है ! वनमैन आर्मी कहे जाने वाले कोरिया कुमार के सन्यास के बाद कोरिया की राजनीति में फिर से आबाद हुए पैलेस के कैम्पस में दम तोड़ रहे कोरिया कुमार के सपनों में फिर से जान आ गयी थी!फकीर राजा के मजबूत कंधों पर तरुणाई गुजार चुके “कुमार साहब के सपनों के कोरिया” ने विधानसभा चुनाव के बाद विरासत की बहुप्रचारित ममता की छांव में जवान होने उम्मीद पाल ली थी! सरलता और सादगी का मायाजाल कुछ इस तरह बुना गया कि टिकट के दो सबसे मजबूत पार्टी स्तम्भों की दावेदारी रौंदकर, जब बंगाल की खाड़ी से चली विकास क्रांति एक्सप्रेस बैकुंठपुर में रुकी तो लोगों ने स्व. कोरिया कुमार की प्रतिकृति को इसमें से उतरते देखा था! नतीजन, ठोस बदलाव की उम्मीद में लोगों ने कांग्रेस द्वारा प्रस्तावित प्रवासी नेतृत्व का साथ देने का फैसला कर लिया! बदलाव की इस बहती बयार ने कैबिनेट मंत्री को तो घर बिठा दिया मगर जीत के डेढ़ साल में ही बदलाव के मायने कुछ ऐसे बदले कि पैलेस की दालान में उभर आये युवा “ढोड़ी ढबरों” में ठहरे भ्रष्टजल की दुर्गंध सोशल मीडिया में अपलोड फोटो और वीडियो से भी नहीं दब पा रही है, नये नये उभरे कई स्वघोषित “गुप्त” वजीर खुद को सत्ता का समानांतर केंद्र ही समझने लगे है और तो और, कांग्रेस के स्थानीय कागजी “सिंहों” का एटीट्यूड देख कर तो कुछ ऐसा महसूस होता है कि अगले चुनाव में जीत के पिछले अंतर इक्यावन सौ को इक्यावन हजार में तब्दील करने कांग्रेस के कर्मठ सिपहसालार बिना जमीन के निर्मित हवाई पट्टी से से ही उड़ान भरेंगे!

जमीनी सच्चाई कुछ यूं है कि जिला अस्पताल में सीनियर डॉक्टरों में अक्सर छिड़ने वाली जंग में मरीजों की कराहटें गुम है, कोविड 19 की महामारी काल में भी पैसा बनाने से पीछे नहीं रहने वाले अस्पताल माफियाओं के कारनामें कभी भी फाइलों से बाहर आ जायेंगे, कॉपरेटिव सोसायटियों में पीडीएस के खाद्यान्न की हेराफेरी की चर्चा करना बहुत छोटी बात है, बिना डायवर्सन कराये व्यवसायिक दुकाने खड़ी करके किराये पर उठाए जा चुके है, पूरे तामझाम से उद्घाटित कई गोठान पूरी तरह से उजाड़ हो चुके है, कुछ सरंक्षण प्राप्त अधिकारी, सिस्टम के कायदे से आजाद हो कर निरंकुश ही हो चुके है, नगरपालिका में भ्रष्टाचार के आरोपों की लंबी फेरहिस्त है, विधायक मद से खोदे गये हैंडपंपों से पानी कम भ्रष्टाचार के आरोप ज्यादा बह रहे है, करप्शन क्वीन के नाम से चर्चा में रहने वाली एक बहुचर्चित तहसीलदार ढेरों विवाद और आरोप के बाद भी ट्रांसफर जैसी छोटी दुर्घटना से भी आज तक अछूती है जबकि दरबारी कार्यकर्ता कलेक्टर डीएफओ तक का बोरिया बिस्तर छह महीने से कम समय में बांध दिए जाने की काबिलियत रखते है! महज डेढ़ साल में कारगुजारियों की फेरहिस्त बहुत लंबी है, सवालों के सिलसिले बहुत फैले हुये है, साथ ही उत्तरों की प्रतीक्षा में खड़े प्रश्नों में बेचैनी भी बहुत है! इन्ही कारगुजारियों के स्पष्टीकरण में, इन्ही सवालों के जवाब में और इन्ही प्रश्नों के उत्तर में स्व.कोरिया कुमार के सपने का कोरिया बसता है और इतनी तो उम्मीद की ही जा सकती है कि कांग्रेस पार्टी के भीतर और बाहर जिले में कुछ लोग तो जरूर होंगे जो स्व. कोरिया कुमार की प्रतिकृति को नहीं उनके सपनों के कोरिया को वोट दिए होंगे! वोट दिए है तो उन सपनों की खातिर सवाल भी पूछिये, जैसे आज मैं पूछ रहा हूँ और जवाब देने वालों को कभी न कभी तो जवाब देना ही होगा वरना पूर्व कैबिनेट मंत्री भईया लाल राजवाड़े की सहजता, सरलता और सादगी में कोई कांटे नहीं उगे थे जो हम जैसे लोग पिछले चुनाव में उनसे बार बार सवाल पूछ कर उनकी विधायकी छिन रहे थे!  फिलहाल तो दुष्यंत कुमार को याद कर लीजिये, शायद आसमान से जमीन में उतरने का कोई ख्याल आ ही जाये…..

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं!
मैं बेपनाह अँधेरों को सुब्ह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं!

   
         

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