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जहां गांधी विस्थापित हो गए वहां न्याय की उम्मीद …….? विधि वक्ताओं की रैली का स्वागत इतिहास की पन्नों की याद दिलाता

 

रायगढ़।
विधि वक्ताओं व राजस्व अधिकारी कर्मचारियों के बीच का विवाद आज किस जगह पर खड़ा है किसी से छुपा नही हैं। निरंतर पिछले दिनों की स्थितियों परिस्थितियों को आम जनता हकीकत और फंसाना सब कुछ देख समझ रही है। इस घटना को समय रहते तात्कालिक सुलझा लिया जाता तो आज यह इस मोड़ पर नहीं होती पर अब तीर छूट चुका है और दूर तलक जाएगी।
सोचते थे कि लालफीता शाही को समझ आ जाये की पर्दे के पीछे का सच कुछ और है और सत्ता में बैठे लोग इसका आंकलन ही नहीं कर पा रहे हैं कि अधिवक्ताओं के द्वारा शुरू की गई लड़ाई आम जनता के मानस पटल पर किस तरह का छाप छोड़ रहा है? यह लड़ाई विधि वक्ताओं से शुरू हुई और वे सब इसे बर्दाश्त कर विधि सम्मत ढंग और अहिंसक रूप से अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं और लड़ेंगे। लेकिन अगर यह लड़ाई त्रस्त और पीड़ितों के द्वारा शुरू हुई होती तो इसे हिंसक होने से क्या कोई रोक पाता?विधि वक्ताओं द्वारा शुरू की गई इस लड़ाई में अगर आम जनता कूद गई तो इसके परिणाम व आंदोलन का रुख व मार्ग जनहित में परिवर्तित होकर हिंसक भी हो जाय तो कह नही सकते । हमने इस मुद्दे को लेकर कई वर्गों से बुद्धिजीवियों,गरीब, किसान से इस विषय पर चर्चा की तो इन्होंने खुलकर अपनी बात कही हम यह लिखने में भी कोताही नही बरतेंगे की भ्रस्ट व्यवस्था का सभी ने खुलकर विरोध किया यह भी कहा कि एक न एक दिन यह जनता करती जो वकीलों ने किया। धाराओं की प्रताड़ना से भले ही वकील आज जेल की सीखचों के पीछे हैं और अब अधिवक्ता मानकर चल रहे हैं कि अब आर या पार होगा- हर हाल में भ्रष्टाचार बंद होगा।
यहां यह भी उल्लेख करना जरूरी होगा कि कोरोना संक्रमण काल के दौरान दो सालों से अदालतों की चौखट को बन्द का सामना करना पड़ा इससे जीविका चलाने वाले विधि वक्तागण जीविका के लिए इन दो सालों में विभिन्न स्थितियों परिस्थितियों से होकर गुजरा है। फिर जो घटना घटित हुई किस परिपेक्ष्य में हुई इसे समझने में न तो जन प्रतिनिधियों ने दिलचस्पी दिखाई और न ही नौकरशाहों ने तवज्जो दिया नतीजा यह निकला कि विधि वक्ता सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल मे है-देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है यही नारा लिए हुए आंदोलन की राह पर हैं।
रायगढ़ के विधि वक्ता जिस राह पर है उस राह पर रायगढ़ की सड़कें आजादी से लेकर अब तक न जाने कितनी आंदोलनों की पदचाप सुन चुकी है। खासतौर पर रायगढ़ की भूमि कई आंदोलन और जन आंदोलन का रुख तय कर चुकी है और उसका समर्थन भी देख चुकी है।भ्रस्टाचार की यह लड़ाई अधिवक्तागण से प्रारम्भ होकर जन आंदोलन बनने की राह के अंतिम छोर में है ।
गत दिवस अधिवक्ताओं की अम्बेडकर प्रतिमा से गांधी प्रतिमा चौक तक की गई अधिवक्ताओं की रैली व आम नागरिकों द्वारा किया गया स्वागत आजादी के उन संस्मरणों की याद दिलाता है जिसे इतिहास के पन्नो या उन दिनों के बड़े बुजुर्गों से सुना है । ये वो दौर देखने को मिल रहा है जहां बाबा साहब अम्बेडकर के बनाये गए संविधान के अनुयायियों को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की विस्थापित गांधी प्रतिमा स्थल पर शांति पूर्ण तरीके से पुलिस अभिरक्षा में स्थापित गांधी प्रतिमा जिनके समक्ष पहुंचकर शांती से आक्रोश व्यक्त करते हुए भ्रस्टाचार के विरुद्ध जन जागरण किया।
खास बात ये है कि अब तक आंदोलनकारी विधि वक्तागण नाउम्मीद नहीं हैं और निरंतर मिल रहा जनसमर्थन जनता की आवाज में तब्दील होने को अग्रसर है कहें तो अतिशयोक्ति नही होना चाहिए कि रायगढ़ की जनता बोलती नहीं पर समय आने पर तख्त-ओ-ताज तक उखाड़ फेंकती है ….।

जय हिंद
क्रमशः…….

शमशाद अहमद

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