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गारे पेलमा सेक्टर 1 जनसुनवाई के विरोध में उबल पड़ा ग्रामीणों का गुस्सा ….प्रशासनिक चेतावनी पत्र ने बढ़ाया तनाव, विधायक विद्यावती सिदार भी मोर्चे पर—‘ग्रामीणों की आवाज़ दबने नहीं देंगे’

 

 

रायगढ़। प्रस्तावित जनसुनवाई को लेकर क्षेत्र में पिछले दो दिनों से माहौल तीखा बना हुआ है। प्रभावित गांवों के सैकड़ों ग्रामीण—जिनमें महिलाएँ, बुजुर्ग और नौजवान बड़ी संख्या में शामिल हैं—लगातार 24 घंटे से जनसुनवाई स्थल पर धरने पर डटे हुए हैं। उनकी आँखों में चिंता है, आवाज़ में आक्रोश और दिल में अपने गांव, जंगल और जमीन को बचाने का संकल्प।
धरने पर बैठे ग्रामीणों का कहना है कि यह लड़ाई किसी राजनीतिक स्वार्थ की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की है। उनका आरोप है कि जनसुनवाई की प्रक्रिया लगातार ग्रामीणों के हितों की उपेक्षा करते हुए आगे बढ़ाई जा रही है, जबकि प्रभावित समुदायों को अपनी बात रखने के लिए भयमुक्त वातावरण मिलना चाहिए।

इस बीच, प्रशासन द्वारा जारी एक चेतावनी पत्र ने वातावरण को और ज्यादा संवेदनशील बना दिया है। पत्र में बिना अनुमति के सभा आयोजित करने और शासकीय कार्य में बाधा पहुँचाने पर सभी के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही गई है। ग्रामीणों ने इस पत्र को सीधे तौर पर “दबाव बनाने की कोशिश” बताते हुए कड़ी नाराज़गी जताई है। उनका कहना है कि जब आवाज़ उठाने पर ही कार्रवाई की बात होने लगे, तो फिर जनसुनवाई किस तरह निष्पक्ष और निर्भय होगी?
ग्रामीणों की इस चिंता को केंद्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 14 सितंबर 2006 के दिशा-निर्देश में स्पष्ट किया है कि जनसुनवाई निर्भीक, निष्पक्ष और बिना किसी प्रशासनिक तनाव के आयोजित की जानी चाहिए, ताकि प्रभावित लोग पर्यावरणीय क्षति, विस्थापन और आजीविका पर होने वाले खतरे को खुलकर बता सकें। लेकिन मौजूदा परिस्थितियाँ इन निर्देशों के विपरीत दिखाई देती हैं।

धरनास्थल पर मौजूद ग्रामीणों के साथ खड़ी स्थानीय विधायक विद्यावती सिदार ने भी प्रशासन के इस पत्र पर कड़ा ऐतराज़ जताया है। उन्होंने साफ कहा कि, “ग्रामीणों को डराकर, दबाकर, धमकाकर कोई जनसुनवाई नहीं होती। जब तक प्रशासन निष्पक्ष माहौल नहीं देगा, ग्रामीणों का विरोध जारी रहेगा। मैं हर हाल में इनके साथ खड़ी हूँ।

धरने में शामिल एक बुजुर्ग महिला ने कहा, “हम अपने जंगल, मिट्टी और खेत बचाने आए हैं। अगर ये सब नहीं रहेगा, तो हम कहाँ जाएंगे? हमारी बात सुने बिना जनसुनवाई का क्या मतलब?”

ग्रामीणों का कहना है कि वे न तो हिंसा चाहते हैं और न ही टकराव। वे सिर्फ इतना चाहते हैं कि सरकार उनके दर्द को समझे और जनसुनवाई को सचमुच “जन” की सुनवाई बनाए।

धरने का आज दूसरा दिन है और माहौल लगातार गरमाता जा रहा है। प्रशासन की आगे की कार्रवाई क्या होगी—इस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। पर इतना साफ है कि ग्रामीण अपने अधिकार और सम्मान की लड़ाई पीछे हटकर नहीं लड़ेंगे।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि ग्रामीण इस कड़ाके की ठंड के बावजूद सारी रात और पूरे दिनभर धरने पर बैठे हुए है और लगातार अपने हक की आवाज उठाने के लिए तत्पर है। ग्रामीणों का कहना है कि वे जिस जमीन पर पूर्वजों से जीते खाते चले आ रहे हैं और चंद नोटो के आगे हमेशा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।

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