
गारे-पलमा में बढ़ता जनाक्रोश …अनुसूचित क्षेत्र में प्रशासन का कठोर आदेश…., शांत आंदोलन कर रहे आदिवासियों पर कार्रवाई की चेतावनी… ठिठुरन में भी ग्रामीण डटे..जन सुनवाई को लेकर प्रशासन दबाव में ..?
रायगढ़ जिले के गारे-पेलमा सेक्टर–1 में प्रस्तावित पर्यावरणीय जनसुनवाई के खिलाफ आदिवासी समुदाय का विरोध अब तेज होता जा रहा है। कोयला परियोजना से प्रभावित ग्रामीण कई दिनों से गांधीवादी तरीके से शांतिपूर्ण धरने पर बैठे हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से जारी एक आदेश ने इस विरोध को और उग्र बना दिया है। ग्रामीण पूछ रहे हैं कि क्या अब लोकतांत्रिक विरोध भी अपराध माना जाएगा?
गारे-पेलमा क्षेत्र पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जहाँ पेसा कानून लागू है। इस कानून के अनुसार ग्रामसभा की अनुमति के बिना किसी भी परियोजना से जुड़े निर्णय नहीं लिए जा सकते। लेकिन ग्रामीणों के विरोध के बीच ही तहसीलदार द्वारा जारी एक लिखित आदेश ने पूरे क्षेत्र का माहौल गरमा दिया है। आदेश में बिना अनुमति विरोध प्रदर्शन करने, जनसुनवाई स्थल के आस-पास शांतिपूर्वक बैठने या रुकने तक को शासकीय कार्य में बाधा माना गया है। इतना ही नहीं, आदेश में यह भी चेतावनी दी गई है कि ऐसा करने वालों पर बीएनएस की धाराओं के तहत आपराधिक प्रकरण दर्ज कर कार्रवाई की जाएगी।

ग्रामीण इसे संवैधानिक अधिकारों का खुला उल्लंघन और अनुसूचित क्षेत्रों में लागू विशेष सुरक्षा कानूनों की अवहेलना बता रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे अपनी जमीन, जीवन और भविष्य को लेकर चिंतित हैं और शांतिपूर्वक अपनी बात रख रहे हैं, लेकिन प्रशासन उन्हें अपराधी की तरह देख रहा है। एक ग्रामीण महिला ने कहा कि हमने पीढ़ियों तक जंगल और जमीन संभाली है। आज जब उद्योगों को सब कुछ सौंपा जा रहा है, तो हमसे पूछा तक नहीं जा रहा। क्या अपनी ही जमीन पर बोलना भी अब जुर्म है?
जनसुनवाई को लेकर उठे सवालों के बीच ग्रामीण प्रशासन पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं। उनका कहना है कि जनसुनवाई को किसी भी कीमत पर जल्दबाजी में पूरा करने की तैयारी की जा रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ दस्तावेजों पर लोगों के हस्ताक्षर पहले से कर दिए गए हैं, कई फॉर्म बिना बताए भर दिए गए और उनकी आपत्तियों को दर्ज नहीं किया गया। इसी वजह से ग्रामीण इसे “फर्जी जनसुनवाई” बता रहे हैं और कहते हैं कि यह प्रक्रिया जनता की भागीदारी के बिना सिर्फ औपचारिकता निभाने जैसी है।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के दिशा-निर्देशों में साफ लिखा है कि किसी भी पर्यावरणीय जनसुनवाई का आयोजन भयमुक्त वातावरण में होना चाहिए, ताकि लोग स्वतंत्र रूप से अपनी बात रख सकें। लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासनिक धमकियों और कानूनी कार्रवाई की चेतावनियों ने पूरे माहौल को डर और दहशत से भर दिया है। ऐसे में वास्तविक जनमत कैसे सामने आएगा? एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह एक बड़ा कुठाराघात दिखाई दे रहा है।
इस आदेश से नाराज ग्रामीण लगातार कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे डटे हुए हैं। महिलाएं, युवा और बुजुर्ग सभी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। उनके हाथों में तख्तियां हैं, जिन पर लिखा है—“ग्रामसभा सर्वोच्च है”, “हम डरने वाले नहीं”, “फर्जी जनसुनवाई नहीं चाहिए।” ग्रामीणों का कहना है कि वे किसी भी दबाव में आकर अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे और अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करेंगे।
एक ग्रामीण नेता ने कहा, अपराधी हम नहीं हैं। अपराध तो यह है कि प्रशासन उद्योगों के लिए काम कर रहा है और जनता की आवाज़ को दबा रहा है। बीएनएस की धाराओं की धमकी देकर लोगों को चुप कराना लोकतंत्र के खिलाफ है। ग्रामीणों का मानना है कि प्रशासन का यह रवैया पेसा कानून की मूल भावना के विपरीत है, जिसमें ग्रामसभा को सर्वोच्च सत्ता माना गया है।

वहीं ग्रामीणों की यह भी मांग है कि जनसुनवाई तभी कराई जाए जब ग्रामसभा की स्पष्ट अनुमति हो। उनका कहना है कि जिस क्षेत्र में पेसा कानून लागू है, वहाँ कानूनी रूप से ग्रामसभा की अनुमति के बिना किसी परियोजना पर जनसुनवाई आयोजित करना ही गलत है। ग्रामीणों का आरोप है कि उद्योगपतियों के दबाव में प्रशासन कानूनों की अनदेखी कर रहा है और किसी भी तरह जनसुनवाई कराने के लिए तत्पर है।

जनता की प्रमुख मांगें हैं कि पेसा कानून का ईमानदारी से पालन किया जाए, ग्रामसभा की अनुमति के बिना कोई प्रक्रिया आगे न बढ़ाई जाए, धमकी भरे आदेश वापस लिए जाएं और एक भयमुक्त वातावरण में वास्तविक जनसुनवाई कराई जाए। ग्रामीणों का कहना है कि वे न तो हिंसा चाहते हैं और न ही टकराव, लेकिन अपने अधिकारों को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे।
अंत में सबसे बड़ा सवाल वहीं खड़ा है—क्या प्रशासन जनता की आवाज़ सुनना चाहता है या उसे दबाना? गारे-पलमा के आदिवासी ग्रामीणों का संघर्ष सिर्फ जमीन को लेकर नहीं, बल्कि सम्मान और अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। प्रशासन की कागजी ताकत कितनी भी बड़ी क्यों न हो, जनता का विश्वास और अधिकार इससे भी बड़ा होता है। ग्रामीणों का दावा है कि अब वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।

ठिठुरन भरी रातों में भी गारे-पेलमा सेक्टर 1 की आग ठंडी नहीं हुई है, बल्कि और तेज होती जा रही है। जनता का कहना है कि अब अगर दमन बढ़ेगा, तो संघर्ष भी उतना ही मजबूत होकर सामने आएगा। यह आंदोलन अब किसी एक गांव का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि पूरे क्षेत्र की आवाज़ बनता जा रहा है।
और यही वह संदेश है जिसे प्रशासन को समझना होगा
जनता जाग चुकी है, और उनके अपने अधिकारों की लड़ाई अब रुकने वाली नहीं है। मौके पर पुलिस फोर्स इस कदर लगाया गया है इससे जाहिर है कि प्रशासन पर जबरदस्त दबाव है ।




