
महापौर-सभापति के वर्चस्व का विवाद सुलट गया हो तो निगम करे आय की चिंता और इन्होंने कहा शहर विकास के लिए जिंदल से करोड़ो की जायज आय लेने के निर्णय पर विलम्ब आखिर क्यों …. सवालों की बौछार ……
रायगढ़। पूर्व पार्षद और जिला भाजपा उपाध्यक्ष आशीष ताम्रकार ने नगर निगम में महापौर तथा सभापति के बीच वर्चस्व को लेकर छिड़ी जंग को शहर विकास के लिए खतरा निरूपित करते हुए कहा है कि अगर दोनों जनप्रतिनिधियों का विवाद सुलट गया हो तो जरा जनहित में भी ध्यान दें। वहीं, निगम के खजाने को भरने को प्राथमिकता देने की बजाए जिंदल से करोड़ों की आय लेने के निर्णय में लेटलतीफी भी लोगो को हजम नहीं हो रही है।
प्रेस विज्ञप्ति जारी कर वरिष्ठ भाजपा नेता आशीष ताम्रकार ने कहा कि दो साल के निगम की कांग्रेस की सरकार शहर विकास में पूरी तरह विफल है। अपने इस कार्यकाल में एक भी ऐसा उपलब्धि नहीं जिससे जनता निष्पक्ष भाव से प्रभावित हो । पहला वर्ष तो पिछले सरकार में हुए टेंडर के कार्यो को भूमि पूजन में निकल गया तो दूसरा साल आपस के वर्चस्व के झगड़े में। जनता अब कांग्रेस को निगम में बहुमत देकर ठगा महसूस कर रही है। निगम में शहर विकास के लिए राशि का अभाव है। ऐसे में आम जनता से टैक्स लेने शक्ति दिखाने वाली निगम आखिर जिंदल के टैक्स वसूली में देर करने में इतनी मेहरबान क्यो है? एक अरब रुपये की राशि का सम्पत्ति कर जिंदल कम्पनी से निगम को लेनी है जिससे निगम के राजस्व में काफी बढ़ोतरी होगी । सम्पत्ति कर प्रति वर्ष लगभग 15 करोड़ रुपये से अब तक का बकाया तकरीबन एक अरब रुपये लेना बकाया है । माननीय न्यायालय ने भी जिंदल कम्पनी कर में छूट के आग्रह को स्वीकार न करते हुये कहा है कि निगम इस पर पुनः विचार करे। मतलब अब गेंद निगम के पाले में है और निगम की सामान्य सभा मे फिर अहम निर्णय लेना है । इतने महत्वपूर्ण विषय में निगम की कांग्रेस सरकार उदासीन है या कम्पनी के प्रति प्रेम जो परिषद का जल्द बैठक बुलाकर इस पर निर्णय ले ।
ज्ञात हो कि भाजपा महापौर महेंद्र चौहथा के कार्यकाल के दौरान जब जिंदल कम्पनी निगम के दायरे में आई, तब से टैक्स बकाया है । तत्कालिक समय में मैं राजस्व प्रभारी था। मेरे द्वारा आयुक्त और राजस्व विभाग को यह निर्देश दिया गया था कि आम नागरिक की तरह ही जिंदल से सम्प्पत्ति कर लें और उन्हें निगम द्वारा इस बाबत बकायदा नोटिस भी दिया गया, तब से कम्पनी न्यूनतम राशि निगम में जमा कर मामला माननीय न्यायालय के समक्ष ले गई। नीयत नहीं होने की वजह से मामला लटकाने में माहिर कम्पनी राशि अदा करने में देर कर सफलता तो पा गई, पर माननीय न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद निगम को फरमान जारी किया है कि पुनः इस पर सहानुभूति पूर्वक विचार करे । अब जब इस पर निगम की सामान्य सभा को तय करनी है तो पिछले परिषद के बैठक में वर्चस्व के झगड़े में ये महत्वपूर्ण निर्णय पर विचार नहीं हुआ । परिषद की बैठक बुलाने में 7 दिन का समय नियमतः होना चाहिए, पर तीन माह होने के बाद भी परिषद की बैठक न बुलाया जाना कम्पनी को अप्रत्यक्ष लाभ देना है या जनता हित से निगम को कोई एतबार ही नहीं ।
आशीष ने यह भी कहा कि जो सम्पत्ति कर निगम द्वारा कम्पनी से मांग की गई है, वह विधि सम्मत है। चूंकि, कम्पनी का क्षेत्र औद्योगिक स्लैब के दायरे में आता है जो शहर के अन्य क्षेत्र से ज्यादा बाजार मूल्य है। ऐसे में जिंदल को पांचवें जोन में रखते हुए जो करारोपण की गई है वो न्याय संगत है। जिंदल क्षेत्र को शहर के अन्य जोन में शामिल नहीं किया जा सकता, यह निर्णय निगम को नियम से ही पारित करनी चाहिए न कि चेहरा देख और न ही बहुमत के आधार पर । ऐसे में परिषद को चाहिए कि जनहित में इस पर जल्द नियमतः निर्णय लें । अगर यह मांग की गई राशि निगम को प्राप्त होती है तो निश्चित रूप से एक सक्षम निगम की श्रेणी में आएगा और इसका पब्लिक टैक्स को कम करने में निगम सक्षम होगा। वहीं, स्थापना व्यय बढ़ने से निगम में कर्मचारी की नियुक्ति का अधिकार होगा जिससे युवाओं को रोजगार के अवसर भी मिलेंगे। फिलहाल, निगम सरकार अब कम्पनी पर और मेहरबान होती है तो मजबूरन भाजपा फिर आंदोलन का रुख अख्तियार कर शहर विकास के लिए सड़क पर उतरने तैयार है।