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70 साल पुराने दस्तावेजों के सामने वन विभाग का दावा नहीं टिक सका! रॉबर्ट डेविड के पक्ष में एसडीएम न्यायालय का फैसला

मिशन कॉलोनी भट्टीपारा की जमीन पर वर्षों से चला आ रहा विवाद, दस्तावेज पेश करने के पर्याप्त अवसर मिलने के बावजूद वन विभाग नहीं कर सका अपना दावा प्रमाणित; अब विभागीय कार्यप्रणाली और डीएफओ की जवाबदेही पर उठ रहे गंभीर सवाल

अनूप बड़ेरिया

बैकुंठपुर, कोरिया। सरकारी जमीन और वन भूमि के दावों को लेकर अक्सर आम नागरिकों को वर्षों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। लेकिन जब किसी जमीन पर लंबे समय से चले आ रहे विवाद में पुराने राजस्व अभिलेख, नामांतरण संबंधी दस्तावेज और न्यायालयीन कार्यवाही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, तब यह सवाल भी उतना ही अहम हो जाता है कि आखिर संबंधित विभाग अपने दावों को प्रमाणित करने के लिए कितनी गंभीरता से प्रयास कर रहा है।

कोरिया जिले के बैकुंठपुर स्थित मिशन कॉलोनी भट्टीपारा की जमीन से जुड़ा मामला इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। मिली जानकारी के अनुसार, वन विभाग द्वारा जमीन पर किए गए दावे को एसडीएम न्यायालय ने अमान्य मानते हुए पक्षकार डेविड प्रकाश रॉबर्ट के पक्ष में फैसला सुनाया है। मामले में विभाग की ओर से जमीन पर अपने अधिकार के समर्थन में ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए जा सके, जिनके आधार पर उसका दावा प्रमाणित हो सके।

इस घटनाक्रम ने वन विभाग की कार्यप्रणाली, पुराने भूमि अभिलेखों के परीक्षण और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

पुराने अभिलेखों में दर्ज जमीन, फिर विवाद की नौबत क्यों आई?

जानकारी के मुताबिक, विवादित भूमि में वन कर्मचारी आवासीय भवन क्रमांक-4, एच टाइप रेंजर क्वार्टर, वन परिक्षेत्र लिपिक भवन तथा खपरेल के पुराने परिक्षेत्र कार्यालय का एक भवन शामिल है। बताया गया है कि ये निर्माण लगभग 50 वर्ष पुराने हैं।

रिपोर्ट में संबंधित भूमि का खसरा क्रमांक 391/1/ख तथा रकबा 0.2070 हेक्टेयर बताया गया है। भूमि के पुराने इतिहास, आवंटन और बाद के राजस्व अभिलेखों को लेकर ही विवाद सामने आया।

उपलब्ध विवरण के अनुसार, वनमंडल की ओर से यह दावा किया गया था कि वर्ष 1948 में वनमंडल के गठन के समय संबंधित भूमि वन विभाग को आवंटित की गई थी। इसके विपरीत, पक्षकार डेविड प्रकाश रॉबर्ट की ओर से प्रस्तुत पुराने अभिलेखों में भूमि के स्वामित्व और उसके बाद हुए नामांतरण का उल्लेख बताया गया।

ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि जब जमीन के पुराने राजस्व अभिलेख उपलब्ध थे, तो विवाद का निराकरण समय रहते क्यों नहीं हो सका? क्या विभाग ने दावा प्रस्तुत करने से पहले सभी ऐतिहासिक दस्तावेजों का समुचित परीक्षण किया था? और यदि भूमि पर विभाग का अधिकार था, तो उसे प्रमाणित करने वाले दस्तावेज न्यायालय में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत क्यों नहीं किए जा सके?

वर्ष 1954-55 के दस्तावेज से लेकर नामांतरण तक का मामला

जानकारी के अनुसार, न्यायालय में प्रस्तुत दस्तावेजों में वर्ष 1954-55 के भूमि अभिलेख का उल्लेख है। रिपोर्ट में बताया गया है कि उस समय जमीन शंभू के नाम दर्ज थी। बाद में उनकी पत्नी महारजिया के नाम प्रविष्टि होने तथा जमीन प्रेमलता के पति न्यूटन रॉबर्ट द्वारा खरीदे जाने का विवरण भी सामने आया।

रिपोर्ट में वर्ष 1974 से 1979 के बीच नामांतरण पंजी में प्रविष्टियां दर्ज होने का उल्लेख है। इसके अतिरिक्त वर्ष 1998 से 2004, 2006 से 2015 तक के अभिलेख भी प्रस्तुत किए जाने की बात कही गई है।

इन दस्तावेजों का महत्व इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि किसी भूमि पर अधिकार का निर्धारण केवल वर्तमान रिकॉर्ड देखकर नहीं, बल्कि उसके ऐतिहासिक अभिलेखों, स्वामित्व की श्रृंखला, नामांतरण की वैधता और लागू कानूनी प्रावधानों की जांच के आधार पर किया जाता है। जो डेविड प्रकाश रॉबर्ट के पास है। अतः न्यायालय ने मामले में प्रस्तुत दस्तावेजों पर विचार करने के बाद पक्षकार डेविड प्रकाश रॉबर्ट के पक्ष में निर्णय सुनाया।

बार-बार नोटिस, फिर भी वन विभाग अपने दावे के समर्थन में क्या प्रस्तुत कर पाया?

इस प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वन विभाग के दावे के समर्थन में दस्तावेजों की उपलब्धता से जुड़ा है।

मिली जानकारी के अनुसार, वन विभाग को अपने दावे के समर्थन में दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए कई बार नोटिस जारी किए गए थे। इसके बावजूद न्यायालय को विभाग की ओर से ऐसे दस्तावेज उपलब्ध नहीं हो सके, जिनसे विवादित जमीन पर उसका दावा प्रमाणित हो सके। यदि यह विवरण न्यायालयीन अभिलेखों से पुष्ट होता है, तो यह विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

आखिर किसी सरकारी विभाग के पास अपनी बताई गई भूमि के स्वामित्व, आवंटन अथवा प्रशासनिक नियंत्रण से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध क्यों नहीं थे? क्या पुराने अभिलेखों को सुरक्षित रखने और समय पर न्यायालय में प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी का उचित निर्वहन किया गया? क्या मामले की पैरवी करने वाले अधिकारियों ने दस्तावेज जुटाने के लिए गंभीर प्रयास किए?

इन प्रश्नों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सरकारी भूमि के संरक्षण की जिम्मेदारी निभाने वाले विभाग से अपेक्षा की जाती है कि वह किसी भी भूमि पर दावा करने से पहले संबंधित अभिलेखों का समुचित परीक्षण करे और न्यायालय में अपने पक्ष को प्रमाणित करने के लिए आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करे। केवल दावा कर देना पर्याप्त नहीं है। उस दावे को कानून और प्रमाणों के आधार पर स्थापित करना भी आवश्यक है।

डीएफओ की जवाबदेही पर उठते सवाल

इस प्रकरण में वन विभाग के दावे के समर्थन में दस्तावेज प्रस्तुत नहीं हो पाने की बात सामने आने के बाद संबंधित वनमंडल कार्यालय की कार्यप्रणाली की समीक्षा किए जाने की जरूरत महसूस होती है।

वनमंडलाधिकारी यानी डीएफओ के प्रशासनिक क्षेत्राधिकार और इस मामले में उनकी वास्तविक भूमिका का निर्धारण संबंधित फाइलों, आदेशों तथा विभागीय जिम्मेदारियों की जांच से ही हो सकता है। फिर भी यह सवाल उचित है कि विवादित भूमि से संबंधित पुराने रिकॉर्ड की उपलब्धता सुनिश्चित करने, न्यायालयीन कार्यवाही की निगरानी करने और विभाग का पक्ष मजबूती से रखने के लिए क्या आवश्यक कदम उठाए गए थे?

यदि अभिलेख उपलब्ध थे, लेकिन उन्हें समय पर प्रस्तुत नहीं किया गया, तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। यदि अभिलेख उपलब्ध ही नहीं थे, तो यह पता लगाया जाना चाहिए कि दशकों पुराने भूमि आवंटन का दावा किन दस्तावेजों के आधार पर किया गया था।

मुद्दा किसी अधिकारी पर बिना जांच आरोप लगाने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि सरकारी भूमि से जुड़े दावों में पारदर्शिता हो और किसी भी स्तर पर लापरवाही सामने आने पर जवाबदेही तय की जाए।

वन कर्मचारी आवास का निर्माण अपने आप में स्वामित्व का अंतिम प्रमाण नहीं

इस प्रकरण में वन कर्मचारी आवासीय भवनों और पुराने कार्यालय भवन का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है। यदि किसी जमीन पर लंबे समय से सरकारी विभाग के भवन मौजूद हैं, तो यह उस भूमि के प्रशासनिक उपयोग का महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है। लेकिन केवल भवन का अस्तित्व ही प्रत्येक परिस्थिति में जमीन के कानूनी स्वामित्व का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।

यही कारण है कि ऐसे मामलों में न्यायालयीन आदेश, भूमि का मूल आवंटन रिकॉर्ड, राजस्व प्रविष्टियां, नामांतरण आदेश और संबंधित विभाग के दस्तावेजों का समग्र परीक्षण अत्यंत आवश्यक होता है।

इसलिए इस मामले में एसडीएम न्यायालय ने दस्तावेजों के आधार पर वन विभाग के दावे को अमान्य माना और पक्षकार के पक्ष में निर्णय सुनाया।

क्या पुराने भूमि विवादों की होगी व्यापक समीक्षा?

मिशन कॉलोनी भट्टीपारा का मामला एक व्यापक प्रशासनिक प्रश्न भी सामने लाता है। जिले में सरकारी विभागों के उपयोग में आ रही पुरानी जमीनों के आवंटन, राजस्व प्रविष्टियों और विभागीय रिकॉर्ड का समय-समय पर परीक्षण होना चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह के विवादों की स्थिति न बने।

वन विभाग और राजस्व विभाग के बीच भूमि अभिलेखों का समन्वय, पुराने दस्तावेजों का डिजिटलीकरण, विभागीय दावों का सत्यापन तथा न्यायालयीन मामलों की नियमित समीक्षा ऐसी व्यवस्थाएं हैं, जिनसे विवादों के समाधान में मदद मिल सकती है।

इस मामले में भी संबंधित अधिकारियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जमीन पर वन विभाग का दावा किन मूल दस्तावेजों के आधार पर किया गया था, न्यायालय में कौन-कौन से अभिलेख प्रस्तुत किए गए और निर्णय के बाद विभाग की आगे की कानूनी कार्रवाई क्या होगी।

रॉबर्ट डेविड के पक्ष में फैसले से बढ़ी उम्मीद

एसडीएम न्यायालय के निर्णय से पक्षकार डेविड प्रकाश रॉबर्ट को राहत मिली है। लंबे समय से चले आ रहे विवाद में दस्तावेजों के आधार पर मिला यह निर्णय उनके पक्ष के लिए महत्वपूर्ण है। फिलहाल, इस घटनाक्रम ने वन विभाग के दावे और उसे प्रमाणित करने के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों को लेकर गंभीर सवाल पैदा किए हैं।

अब जवाबदेही तय करने की बारी

मिशन कॉलोनी भट्टीपारा की जमीन का विवाद केवल एक पक्षकार और एक विभाग के बीच जमीन का मामला नहीं रह गया है। यह सरकारी अभिलेखों के संरक्षण, विभागीय दावों की विश्वसनीयता और न्यायालयीन कार्यवाही में प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न भी है।

यदि न्यायालय में वन विभाग अपने दावे के समर्थन में आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका, तो संबंधित फाइलों की समीक्षा कर यह पता लगाया जाना चाहिए कि इसकी वजह क्या थी। क्या दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे, क्या उनके संकलन में चूक हुई या विभागीय समन्वय में कोई कमी रही?

कोरिया जिला प्रशासन और वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को इन सवालों पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि वास्तविक तथ्य सामने आएं और यदि किसी स्तर पर लापरवाही प्रमाणित होती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जा सके।

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